आज गाँव में, एक ही घर में दो लड़कियों की शादी थी । लखमी बाई ने एक दिन पहले ही अपनी दोनों बच्चियों को आगाह कर दिया था कि बारात की झूठी पत्तलें उठाने के लिए उन्हें भी उसके साथ जाना पड़ेगा । सुबह से, गीता एवं सुरभि को एक-दो बार याद भी दिला चुकी थी । सुरभि का शादी में पत्तल उठाने का आज 'पहला-दिन' था; वह बड़ी उमंग एवं उत्साह से तैयार हुई, उसने 'नये कपड़े' भी पहने, 'पहला-दिन' जो था ।
सुरभि टोकरी उठा कर आयोजन स्थल पर समय से ही पहुँच गई । पत्ते की पत्तलें उठाते वक़्त टूट जाती थीं । बचे हुए खाने से सनी पत्तलों से उसके हाथ गंदे हो गये । टोकरी तो लखमी ने उठा ली और पत्तलों को टाट में बांधकर सुरभि के सिर पर रख दिया ।
टाट की गाँठ खुल गई । पत्तलें 'हरिजन-कन्या' के सिर पर बरस पड़ीं जैसे किसी ने नौकरी के पहले दिन पर फूल बरसा कर स्वागत किया हो ।
सुरभि के 'नये-कपड़े' ख़राब गए । माथे पर एक तात्क्षणिक शिकन के साथ, सुरभि, पत्तलों को उठकर टाट पर रखने लगी ।
सुरभि टोकरी उठा कर आयोजन स्थल पर समय से ही पहुँच गई । पत्ते की पत्तलें उठाते वक़्त टूट जाती थीं । बचे हुए खाने से सनी पत्तलों से उसके हाथ गंदे हो गये । टोकरी तो लखमी ने उठा ली और पत्तलों को टाट में बांधकर सुरभि के सिर पर रख दिया ।
टाट की गाँठ खुल गई । पत्तलें 'हरिजन-कन्या' के सिर पर बरस पड़ीं जैसे किसी ने नौकरी के पहले दिन पर फूल बरसा कर स्वागत किया हो ।
सुरभि के 'नये-कपड़े' ख़राब गए । माथे पर एक तात्क्षणिक शिकन के साथ, सुरभि, पत्तलों को उठकर टाट पर रखने लगी ।
No comments:
Post a Comment