Dec 15, 2015

Propose

मैं काफी दिनों से एक लड़की के बारे में सोच रहा था।  जब उसके साथ समय बिताने की सारी  तरकीबें असफल होने लगीं तो लगने लगा था कि शायद propose  करने में अब और देरी नहीं करनी चाहिए। बड़ी कश्मकश के बाद खुद को इस बात के लिए तैयार कर पाया था।

वैसे तो काफी बातें होती हैं जो propose करने से पहले पूछी या बताई जा सकतीं हैं, हालाँकि जरुरी तो कुछ भी नहीं होता है।  इसी उथापहोह में सोचा कि, उससे पूछ लिया जाए की कहीं कोई और लड़का तो नहीं ; जो उसके विचार-मंथन की धुरी या चिंतन का केंद्र हो, पर दूसरे ही क्षण लगा कि यह पूरा निर्णय उसका होना चाहिए कि उसे मैं पसन्द  हूँ  भी , या नहीं।  दूसरे शब्दों में, किसी और में और मुझ में से किसी एक को प्राथमिकता देने का अधिकार भी सिर्फ उसे ही होना चाहिए।  इस तरह से कुछ पूछना व्यर्थ तो प्रतीत हुआ ही, पर साथ ही यह भी लगा कि कहीं-न-कहीं उसके निर्णय लेने के अधिकार के दायरे (domain ) और भी बढ़ गए हों।

कुछ खुद के बारे में या अपनी भावनाओं के उत्पन्न होने के कारण बताने से उसके स्वतंत्र निर्णय के प्रभावित होने का डर था।  मेरे लिए उसका स्वतंत्र निर्णय ही महत्वपूर्ण था।  शायद यह धनात्मक प्रभाव ही डालता पर मुझे यह, रिश्वत देना सा जान पड़ा।  वैसे मैंने भी उसमें बहुत कुछ देखा है , तो ज्यादा कुछ पूछने की जरुरत भी नहीं रह गई थी।  .... तो शायद मुझे यह ही कहना चाहिए कि -"मुझे तुम पसन्द हो।  क्या तुम भी.... ?"