Mar 19, 2019

मेरे हाथ

हथेली से बाहर झांकती-
नीली शिरायें,
खूबसूरती की लांघती हैं-
सीमायें,
पीले हाथों की|
पीले हुए नहीं, हो गए हैं!

सर्दी की पपड़ियाँ,
उम्र के पड़ाव से पहले झुर्रियाँ,
यही नहीं,
महसूस सा होता-
रक्त का झीना प्रवाह
और गर्माहट,
इन निश्चेष्ट ठण्डे हाथों में|

कमज़ोर हुए तो क्या?
हाथ तो मेरे हैं !

Mar 3, 2019

घड़ी

घड़ी बन्द पड़ी है,
कोई टिक-टिक की आवाज नहीं
मैं भी रुका हुआ हूँ,
पर समय चल रहा है, जैसे-
दीपक बुझा हुआ है, पर
तेल जल रहा है ! 

Feb 15, 2019

No title

मेरा भी
मन करता है कि
खुशियों पर कविता लिखूँ|
रंगरेजां की चूनर
और
हरी चूड़ियों पर लिखूँ |

यही क्यों,
स्निग्ध-स्मिता की आँखों के लिए,
नव-यौवना की बिंदी और बातों के लिए,
नव-युवक की पहली नौकरी
और
पहली बार पिता बनने पर लिखूँ |

यही नहीं,
फे़न उगलती लहरों पर या नदी के उत्थान पर,
नीरव कलरव पर या ध्रुवीय शांति महान पर,
श्रमिक की शाम पर या पथिक की थकान पर,
योगी के अंतर्धान या धूर्त की मुस्कान पर,
साँसों के उत्थान या मदहोशी के अवसान पर,
दूध - गुड़ घी और मिष्टान्न पर !

वजह यह नहीं कि-
मैं खुश हूँ या होना चाहता हूँ!
लेकिन यह कि-
मैं खुद़ पर लिखना नहीं चाहता !