Dec 22, 2015
Dec 15, 2015
Propose
मैं काफी दिनों से एक लड़की के बारे में सोच रहा था। जब उसके साथ समय बिताने की सारी तरकीबें असफल होने लगीं तो लगने लगा था कि शायद propose करने में अब और देरी नहीं करनी चाहिए। बड़ी कश्मकश के बाद खुद को इस बात के लिए तैयार कर पाया था।
वैसे तो काफी बातें होती हैं जो propose करने से पहले पूछी या बताई जा सकतीं हैं, हालाँकि जरुरी तो कुछ भी नहीं होता है। इसी उथापहोह में सोचा कि, उससे पूछ लिया जाए की कहीं कोई और लड़का तो नहीं ; जो उसके विचार-मंथन की धुरी या चिंतन का केंद्र हो, पर दूसरे ही क्षण लगा कि यह पूरा निर्णय उसका होना चाहिए कि उसे मैं पसन्द हूँ भी , या नहीं। दूसरे शब्दों में, किसी और में और मुझ में से किसी एक को प्राथमिकता देने का अधिकार भी सिर्फ उसे ही होना चाहिए। इस तरह से कुछ पूछना व्यर्थ तो प्रतीत हुआ ही, पर साथ ही यह भी लगा कि कहीं-न-कहीं उसके निर्णय लेने के अधिकार के दायरे (domain ) और भी बढ़ गए हों।
कुछ खुद के बारे में या अपनी भावनाओं के उत्पन्न होने के कारण बताने से उसके स्वतंत्र निर्णय के प्रभावित होने का डर था। मेरे लिए उसका स्वतंत्र निर्णय ही महत्वपूर्ण था। शायद यह धनात्मक प्रभाव ही डालता पर मुझे यह, रिश्वत देना सा जान पड़ा। वैसे मैंने भी उसमें बहुत कुछ देखा है , तो ज्यादा कुछ पूछने की जरुरत भी नहीं रह गई थी। .... तो शायद मुझे यह ही कहना चाहिए कि -"मुझे तुम पसन्द हो। क्या तुम भी.... ?"
वैसे तो काफी बातें होती हैं जो propose करने से पहले पूछी या बताई जा सकतीं हैं, हालाँकि जरुरी तो कुछ भी नहीं होता है। इसी उथापहोह में सोचा कि, उससे पूछ लिया जाए की कहीं कोई और लड़का तो नहीं ; जो उसके विचार-मंथन की धुरी या चिंतन का केंद्र हो, पर दूसरे ही क्षण लगा कि यह पूरा निर्णय उसका होना चाहिए कि उसे मैं पसन्द हूँ भी , या नहीं। दूसरे शब्दों में, किसी और में और मुझ में से किसी एक को प्राथमिकता देने का अधिकार भी सिर्फ उसे ही होना चाहिए। इस तरह से कुछ पूछना व्यर्थ तो प्रतीत हुआ ही, पर साथ ही यह भी लगा कि कहीं-न-कहीं उसके निर्णय लेने के अधिकार के दायरे (domain ) और भी बढ़ गए हों।
कुछ खुद के बारे में या अपनी भावनाओं के उत्पन्न होने के कारण बताने से उसके स्वतंत्र निर्णय के प्रभावित होने का डर था। मेरे लिए उसका स्वतंत्र निर्णय ही महत्वपूर्ण था। शायद यह धनात्मक प्रभाव ही डालता पर मुझे यह, रिश्वत देना सा जान पड़ा। वैसे मैंने भी उसमें बहुत कुछ देखा है , तो ज्यादा कुछ पूछने की जरुरत भी नहीं रह गई थी। .... तो शायद मुझे यह ही कहना चाहिए कि -"मुझे तुम पसन्द हो। क्या तुम भी.... ?"
Sep 8, 2015
Status Quo
मुझे पता था, वह शाम को वहाँ बैठी होगी; हमेशा की तरह, हाथ में न्यूज़पेपर थामे | अभी एक हफ़्ते पहले ही तो उसने कहा था कि - "तुम कौन होते हो मुझे दिशा-निर्देशित करने वाले और अब से हम बात नहीं करेंगे |"
इस एक हफ़्ते में, मैंने कई बार उसे देखा एवं कई बार उसने भी मुझे देखा, पर मैं समझ नहीं पाया कि वे चिर-परिचित आँखे थीं या नहीं |
उसे क्या पता कि मुझ पर क्या गुजरी थी | उसे देखकर, अनदेखा करने के लिए मुझे खुद से कितना लड़ना पड़ा था | पूरे दो दिन तक 'मौन व्रत' रखा था खुद को यह दिलासा दिलाने के लिए कि मैं किसी से भी बात नहीं कर रहा हूँ, इसीलिए उस से भी बात नहीं कर रहा हूँ |
आज जब नहीं रहा गया तो, डरते - डरते उससे पूछ ही लिया -"अभी तक गुस्सा शांत नहीं हुआ ?" जवाब आया -"नहीं |" फिर क्या था, वह शुरू हो गई बताने कि, क्यों गुस्सा शांत नहीं हुआ था ; एक से बढ़कर एक कारण , कुछ सटीक तो , कुछ महज आवेश | पानी को बहते देख मुझे थोड़ी राहत मिल रही थी |
जब उसने देखा कि , उसकी 'डाँट' का मुझ पर कोई असर नहीं हो रहा था तो उसने अपनी आवाज को और भी तेज कर लिया | एक बार मैंने सोचा कि कह दूँ कि - "हम आराम से भी बात कर सकते हैं पर फिर दूसरे ही क्षण लगा कि जितना तेज बोलेगी उतना ही अच्छा ; मैंने यह भी नहीं देखा कि मुझ पर पड़ती 'डाँट' को कोई और भी सुन रहा है या नहीं , पर जैसे ही मैंने देखा कि वो बीच-बीच में बाहर की ओर देख लेती है कि- "कहीं कोई और तो नहीं आ रहा है, यह देख मेरी हंसी छूट गई ...| वह बोलती रही और में उसकी आवाज को सुनता रहा |....
इसी बीच कुछ लोगों को आते देख, उसने आवाज धीमी कर ली और ऐसे बात करने लगी जैसे हम बरसों के परिचित हों | थोड़ी ही देर में उसने वार्तालाप ख़त्म करने का इशारा कर दिया और एक कागज़ पर कुछ लिख कर चली गई | उस पर लिखा था कि -"today's conversation has in no way normalised the situation & let the Status Quo remain as it was before this conversation."
मैं सोचता रह गया कि बिना गुस्से के " Status Quo maintain" कैसे हो पायेगा ?
इस एक हफ़्ते में, मैंने कई बार उसे देखा एवं कई बार उसने भी मुझे देखा, पर मैं समझ नहीं पाया कि वे चिर-परिचित आँखे थीं या नहीं |
उसे क्या पता कि मुझ पर क्या गुजरी थी | उसे देखकर, अनदेखा करने के लिए मुझे खुद से कितना लड़ना पड़ा था | पूरे दो दिन तक 'मौन व्रत' रखा था खुद को यह दिलासा दिलाने के लिए कि मैं किसी से भी बात नहीं कर रहा हूँ, इसीलिए उस से भी बात नहीं कर रहा हूँ |
आज जब नहीं रहा गया तो, डरते - डरते उससे पूछ ही लिया -"अभी तक गुस्सा शांत नहीं हुआ ?" जवाब आया -"नहीं |" फिर क्या था, वह शुरू हो गई बताने कि, क्यों गुस्सा शांत नहीं हुआ था ; एक से बढ़कर एक कारण , कुछ सटीक तो , कुछ महज आवेश | पानी को बहते देख मुझे थोड़ी राहत मिल रही थी |
जब उसने देखा कि , उसकी 'डाँट' का मुझ पर कोई असर नहीं हो रहा था तो उसने अपनी आवाज को और भी तेज कर लिया | एक बार मैंने सोचा कि कह दूँ कि - "हम आराम से भी बात कर सकते हैं पर फिर दूसरे ही क्षण लगा कि जितना तेज बोलेगी उतना ही अच्छा ; मैंने यह भी नहीं देखा कि मुझ पर पड़ती 'डाँट' को कोई और भी सुन रहा है या नहीं , पर जैसे ही मैंने देखा कि वो बीच-बीच में बाहर की ओर देख लेती है कि- "कहीं कोई और तो नहीं आ रहा है, यह देख मेरी हंसी छूट गई ...| वह बोलती रही और में उसकी आवाज को सुनता रहा |....
इसी बीच कुछ लोगों को आते देख, उसने आवाज धीमी कर ली और ऐसे बात करने लगी जैसे हम बरसों के परिचित हों | थोड़ी ही देर में उसने वार्तालाप ख़त्म करने का इशारा कर दिया और एक कागज़ पर कुछ लिख कर चली गई | उस पर लिखा था कि -"today's conversation has in no way normalised the situation & let the Status Quo remain as it was before this conversation."
मैं सोचता रह गया कि बिना गुस्से के " Status Quo maintain" कैसे हो पायेगा ?
May 31, 2015
May 22, 2015
धूल
"मम्मी ! देखो, आज रिहाना अपनी मम्मी के साथ हमारे घर में सफाई करने आई है । वो भी तो मेरे बराबर ( उम्र ) ही है और मैं तो '2nd क्लास' में हूँ, पर ये तो 'स्कूल' नहीं जाती होगी ना ?" रिषिका ने धूप में बैठे-बैठे, अपने 'क्रिसमस-ट्री चार्ट' में रंग भरते हुए पूछा। "हाँ बेटा।"
थोड़ी देर में रिहाना सीढ़ियों पर झाड़ू लगाकर नीचे आ गई। उसने आँगन का एक हिस्सा झाड़कर , कचरा इकट्ठा किया और दूसरी ओर से झाड़कर लाने लगी। मम्मी, इसको बोलो की ये 'स्कूल' जाए.… पर इसको 'टीचर' की डाँट भी नहीं पड़ती होगी ना? "हाँ बेटा, नहीं पड़ती होगी। पर इस बार जरा मुस्कुरा कर जवाब आया।
"मम्मी, धू …ल आ रही है ," रिषिका ने शिकायत भरे स्वर में कहा। "रिहाना उधर ही भर ले, इधर बच्ची काम कर रही है।" तब तक रिषिका ने शाल के एक किनारे से नाक बंद कर ली थी।
थोड़ी देर में रिहाना सीढ़ियों पर झाड़ू लगाकर नीचे आ गई। उसने आँगन का एक हिस्सा झाड़कर , कचरा इकट्ठा किया और दूसरी ओर से झाड़कर लाने लगी। मम्मी, इसको बोलो की ये 'स्कूल' जाए.… पर इसको 'टीचर' की डाँट भी नहीं पड़ती होगी ना? "हाँ बेटा, नहीं पड़ती होगी। पर इस बार जरा मुस्कुरा कर जवाब आया।
"मम्मी, धू …ल आ रही है ," रिषिका ने शिकायत भरे स्वर में कहा। "रिहाना उधर ही भर ले, इधर बच्ची काम कर रही है।" तब तक रिषिका ने शाल के एक किनारे से नाक बंद कर ली थी।
Feb 17, 2015
Thank you (part 1)
आज मैंने पापा की रेल यात्रा के लिए एक टिकट 'तत्काल सेवा' से बुक करवाया । इसमें कोई नयी बात नहीं थी, क्योंकि ज्यादातर अनियोजित यात्राओं के लिए 'तत्काल' टिकट की ही आदत हो गई है और गनीमत है कि 'IRCTC' भी नवीनतम उन्नयन (up gradation) से यथोचित सेवाएं प्रदान कर रही है । यह सब तो ठीक है पर समस्या शुरू हुई पापा के 'confirmation call' से, उन्होंने कहा कि -"हाँ बेटा टिकट हो गया है , Thank you".
उन्होंने जिन 'आज्ञाओं /order' को 'taken for granted' मान रखा था आज उनको मेरे विवेकाधीन (discretionary) मान लिया है । मुझे, अपने आप से विभिन्न, एक व्यक्तिगत मुक्त इकाई (individual and separate identity) मान लिया है । एक Thank you' से उन्होंने मेरे और अपने बीच एक लकीर खींच दी है । जहाँ अभी तक उनके निर्णय मेरे सपनों की उड़ान के लिए पंख होते थे, अब मुझे लगता है कि मैंने 'चलना' भी सीख लिया है जिससे उड़ना या चलना मेरे विवेकाधीन हो गए हैं । हालाँकि सभ्य समाज में अभिवादन शब्दों को यथोस्थान, उत्तम माना गया है पर जाने क्यों ; मैं इनका 'आज' स्वागत नहीं कर पाया । इस अंतर ने आज मुझे मानने पर मजबूर कर दिया कि मैं 'बड़ा' हो गया हूँ । काश! आज उन्होंने 'Thank you' ना बोला होता तो, मैं बचपने में थोड़ा और जीता ।
उन्होंने जिन 'आज्ञाओं /order' को 'taken for granted' मान रखा था आज उनको मेरे विवेकाधीन (discretionary) मान लिया है । मुझे, अपने आप से विभिन्न, एक व्यक्तिगत मुक्त इकाई (individual and separate identity) मान लिया है । एक Thank you' से उन्होंने मेरे और अपने बीच एक लकीर खींच दी है । जहाँ अभी तक उनके निर्णय मेरे सपनों की उड़ान के लिए पंख होते थे, अब मुझे लगता है कि मैंने 'चलना' भी सीख लिया है जिससे उड़ना या चलना मेरे विवेकाधीन हो गए हैं । हालाँकि सभ्य समाज में अभिवादन शब्दों को यथोस्थान, उत्तम माना गया है पर जाने क्यों ; मैं इनका 'आज' स्वागत नहीं कर पाया । इस अंतर ने आज मुझे मानने पर मजबूर कर दिया कि मैं 'बड़ा' हो गया हूँ । काश! आज उन्होंने 'Thank you' ना बोला होता तो, मैं बचपने में थोड़ा और जीता ।
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