मेज पर दो सिक्के रखे हुए थे। एक २०१४ मुद्रित तो दूसरा सन २००० में ढला था, लेकिन दोनों पर 'एक' ही अंकित था। समान मूल्य होने पर भी समानता नाममात्र नहीं थी ।
जहाँ एक नया, चमकदार एवं कसावट लिए हुए था तो दूसरा पुराना एवं बुझा-बुझा सा। यहाँ तक कि ढलाई के उभार भी घिस चुके थे। जहाँ नए सिक्के पर सुगन्धित पद्म-पुष्प खिल हुए थे तो पुराने पर उन्नत गेहूँ की बालियाँ लहलहा रहीं थीं।
स्वाभाविक ही था, मुद्रक ने सोचा भी नहीं होगा की 'नया' सिक्का भूख मिटा पाने सक्षम होगा । नये सिक्के में बस 'चमक' थी, 'खनक' नहीं ।
bahot saare khyaal chor hate hai aapke vichar pathak ke man me...
ReplyDeletedhanyawaad :-)
sunkar achha laga, vaise garima, khayal apake chintansheel hone se aate hain...
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