हथेली से बाहर झांकती-
नीली शिरायें,
खूबसूरती की लांघती हैं-
सीमायें,
पीले हाथों की|
पीले हुए नहीं, हो गए हैं!
सर्दी की पपड़ियाँ,
उम्र के पड़ाव से पहले झुर्रियाँ,
यही नहीं,
महसूस सा होता-
रक्त का झीना प्रवाह
और गर्माहट,
इन निश्चेष्ट ठण्डे हाथों में|
कमज़ोर हुए तो क्या?
हाथ तो मेरे हैं !
नीली शिरायें,
खूबसूरती की लांघती हैं-
सीमायें,
पीले हाथों की|
पीले हुए नहीं, हो गए हैं!
सर्दी की पपड़ियाँ,
उम्र के पड़ाव से पहले झुर्रियाँ,
यही नहीं,
महसूस सा होता-
रक्त का झीना प्रवाह
और गर्माहट,
इन निश्चेष्ट ठण्डे हाथों में|
कमज़ोर हुए तो क्या?
हाथ तो मेरे हैं !



