Oct 29, 2014

कड़क

सागर, एक अधेड़, पर वृद्ध प्रतीत होता था;दिन में बस दो घंटे ही काम करता था । कड़ाके  की सर्द सुबह तो बस ७-८ कार ही साफ कर पाता था । ८० रु/प्र.ली. पेट्रोल के दौर में उसे एक कार साफ करने दस रुपये मिलते थे। 

आज शर्माजी की बहिन सुसराल रही थी और सागर ने बड़ा  लगाकर उनकी कार साफ की थी । मन-ही-मन आशा थी कि -"आज तीस से कम  न मिलेंगे", पर साथ ही आशंका भी थी । 

इसी मानसिक द्वन्द एवं उधेड़बुन में उसे पता ही नहीं चला कि  शर्माजी कब अपनी बहिन को विदा करने के बाद, उसके हाथ में दस रुपये नोट थमा कर घर के अंदर चले  गए । वह नोट थामे खड़ा रहा; नोट स्पर्श से ही अपने अंतर मन  गुदगुदाने  प्रयत्न करता रहा एवं कई बार नोट को मुट्ठी में भींचकर तोड़ने-मोड़ने  के बाद सब्र कर लिया कि- "नोट 'कड़क' था ।" 


2 comments:

  1. aaap kam shabdon me apni baat ko ruchikar andaaz me behtar tareeke se prastut kr lete hai..bahot pasand aaya
    in fact, Akelapan ka coflict bhi interesting laga...congratulation Satyendra :-)

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  2. Aap kah rahin hain toh man leta hun, Dhanyavad Garima. yeh sab samanya si lagane wali batein hain par ek ruchikar tarike mein likhane ki koshish ki hai :)

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