Oct 31, 2014

क्यूट

वो ठिठक कर रुक गई | मैंने देखा, फुटपाथ एक महिला अपने दो बच्चों के साथ भीख माँग रही थी | बच्चे एक से तीन साल की उम्र के थे |  छोटा बच्चा सिगरेट के खाली पैकेट के साथ तो बड़ा बिस्किट पैकेट "पारले-जी"  के साथ खेल रहा था |

बड़े ही प्यारे बच्चे थे एवं समझदार भी प्रतीत होते थे | बच्चा  खाने से ज्यादा खेलना चाहता था जैसे उसे पता था कि-"खेलने से 'पारले-जी' ख़त्म नहीं होगा |" यद्धपि वह ज्यादा तक उससे खेल नहीं पायेगा और अंतत खा ही लेगा | बिस्किट उसे आत्मसंतुष्टि प्रदान कर रहा था कि-"वह निर्धन नहीं है |" मेरे लिये 'ऐसे' दृश्य कोई नई बात नहीं थी |

कुछ ही देर बाद 'वो' फिर से एक कुतिया एवं उसकी बगल में लेटे पिल्लों को देखकर रुकी और बोली - "ओह! 'लुक', कितने 'क्यूट' हैं |


Oct 30, 2014

अकेलापन

म्मी ! सालभर बाद आये हैं न यहाँ पर ? हाँ, पिछली 'गरमिन' की छुट्टियों ही तो आये थे; अस्सी वर्षीया दादी, जो पैतृक मकान में अकेले रहतीं हैं,  ने पहले ही बोल दिया । "हाँ घनश्याम, तुम्हारी दादी  ठीक ही कहतीं हैं", घर की सफाई में तल्लीन मम्मी  ने अंदर से ही जवाब दिया । 

मैंने भी अंदर जाकर देखा, कमर मकड़ी के जालों और धूल से भरा हुआ था। आलमारी की घड़ी भी बंद  हो गई थी, सोचा अच्छा ही हुआ, "कुट्ट - कुट्ट" शोर करती रहती थी। वैसे भी इस उम्र में दादी को शायद समय देखने की जरुरत न पड़ती हो । 

तभी पीछे से दादी की आवाज आई -"अरे ! घन्शु, इस घड़ी को देख लेना ! शायद सैल ख़त्म हो गया है ।  इसकी 'टिक - टिक' से मन लगा रहता है । इसकी आवाज से घर में अकेली होने पर भी अकेलापन नहीं लगता ।"

Oct 29, 2014

कड़क

सागर, एक अधेड़, पर वृद्ध प्रतीत होता था;दिन में बस दो घंटे ही काम करता था । कड़ाके  की सर्द सुबह तो बस ७-८ कार ही साफ कर पाता था । ८० रु/प्र.ली. पेट्रोल के दौर में उसे एक कार साफ करने दस रुपये मिलते थे। 

आज शर्माजी की बहिन सुसराल रही थी और सागर ने बड़ा  लगाकर उनकी कार साफ की थी । मन-ही-मन आशा थी कि -"आज तीस से कम  न मिलेंगे", पर साथ ही आशंका भी थी । 

इसी मानसिक द्वन्द एवं उधेड़बुन में उसे पता ही नहीं चला कि  शर्माजी कब अपनी बहिन को विदा करने के बाद, उसके हाथ में दस रुपये नोट थमा कर घर के अंदर चले  गए । वह नोट थामे खड़ा रहा; नोट स्पर्श से ही अपने अंतर मन  गुदगुदाने  प्रयत्न करता रहा एवं कई बार नोट को मुट्ठी में भींचकर तोड़ने-मोड़ने  के बाद सब्र कर लिया कि- "नोट 'कड़क' था ।" 


Oct 27, 2014

नये कपड़े

  गाँव में, एक ही घर में दो लड़कियों की शादी थी । लखमी बाई ने एक  दिन पहले ही अपनी दोनों बच्चियों को आगाह कर दिया था कि बारात की झूठी पत्तलें उठाने के लिए उन्हें भी उसके साथ जाना पड़ेगा । सुबह से, गीता एवं सुरभि को एक-दो बार याद भी दिला चुकी  थी । सुरभि का शादी में पत्तल उठाने का आज 'पहला-दिन' था; वह बड़ी उमंग एवं उत्साह से तैयार हुई, उसने  'नये कपड़े' भी पहने, 'पहला-दिन' जो था ।

सुरभि टोकरी उठा कर आयोजन स्थल पर समय से ही पहुँच गई । पत्ते की पत्तलें उठाते वक़्त टूट जाती थीं । बचे हुए खाने से सनी पत्तलों से उसके हाथ गंदे हो गये । टोकरी तो लखमी ने उठा ली और पत्तलों  को टाट में बांधकर सुरभि के सिर  पर रख दिया । 

टाट की गाँठ खुल गई । पत्तलें 'हरिजन-कन्या' के सिर  पर बरस पड़ीं जैसे किसी ने नौकरी के पहले दिन पर फूल बरसा कर स्वागत किया हो । 

सुरभि के 'नये-कपड़े' ख़राब गए । माथे पर एक तात्क्षणिक शिकन के साथ, सुरभि, पत्तलों को उठकर टाट पर रखने  लगी । 


रुपया

मेज पर दो सिक्के रखे हुए थे। एक २०१४ मुद्रित तो दूसरा सन २००० में ढला था, लेकिन दोनों पर 'एक' ही अंकित था। समान मूल्य होने पर भी समानता नाममात्र नहीं थी । 

जहाँ एक नया, चमकदार एवं कसावट लिए हुए था तो दूसरा पुराना एवं बुझा-बुझा सा। यहाँ तक कि ढलाई के उभार भी घिस चुके थे। जहाँ नए सिक्के पर सुगन्धित पद्म-पुष्प खिल  हुए थे तो पुराने पर उन्नत गेहूँ की बालियाँ लहलहा रहीं थीं। 

स्वाभाविक ही था, मुद्रक ने सोचा भी नहीं होगा की 'नया' सिक्का भूख मिटा पाने सक्षम  होगा । नये सिक्के में बस 'चमक' थी, 'खनक' नहीं ।