"...हाँ, हाँ; यही चैक शर्ट. अच्छी लगेगी, इसे लोग देखते ही दुकान पर टूट पडे़ंगे. दुकान के बाहर ही लगा, बस एक बार लोगों की नज़र इस पर पड़ जाए. वैसे यह मुझे भी पसन्द है, कुछ दिन बाद शायद मैं खुद, अपने लिए ही ले लूंगा." या तो शर्ट वास्तव में अच्छी थी, या फिर अफज़ल का नई दुकान खोलने का उत्साह बोल रहा था.
उसके बाद उसने कई दिनों तक उस शर्ट की सुध नहीं ली। हालाँकि वह लोगों का ध्यान आकर्षित तो करती थी पर कीमत अधिक होने से उचित खरीददार नहीं मिल सका था।
उसके बाद उसने कई दिनों तक उस शर्ट की सुध नहीं ली। हालाँकि वह लोगों का ध्यान आकर्षित तो करती थी पर कीमत अधिक होने से उचित खरीददार नहीं मिल सका था।
धूल की परतें जम जाने से रंग भी बदल गया था। साथ ही शायद किसी ने तेल के चिकने हाथ कंधे से पोंछ दिए थे, जिससे कुछ धब्बे भी उभर आये थे। एक दिन जब अफजल की निगाह बाँह की उधड़ी हुई सिलाई पर पड़ गई तो उसने शर्ट को हटा देने का मन बनाया, पर फिर कुछ नहीं किया। शायद इसलिए कि - "अब भी यह शर्ट दूर से ही कपडे की दुकान होना तो इंगित कर ही देती थी ।"
kuch shabdo me baat kah dena ek achi kala hai.
ReplyDeleteye toh aapki parakhi nazaron ka painapan hi hai jiski vajah se aapko ye normal se incidents achhe lagte hain.
DeleteHamare naam ka prayog bina hamari permisn k? Kadapi uchit nahi- revenue me se kuch hissa hamara bhi hona chaiye! :P You write like a post modernist but before that is it written by you? I somehow also remembered your essay in which you wrote the story of two girls- Suha n Safi!!
DeleteRevenue me share! aap pura ka pura le lijiye. i liked your complement as a 'post modernist'. abhi tak to 'progressivism' and 'romanticism' ki debate me hi uljhe hue the.
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